उत्तर: गीता 4:2 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह योग गुरु-शिष्य परंपरा से राजर्षियों द्वारा जाना गया था। लेकिन समय के साथ यह परंपरा टूट गई और यह दिव्य ज्ञान पृथ्वी से लुप्त हो गया।
सत्य मिटता नहीं… लेकिन लोग उससे दूर हो जाते हैं।
यदि यह योग सनातन था, तो फिर लोगों ने उसे क्यों भुला दिया?
गीता 4:2 इसी प्रश्न का उत्तर देती है।
📖 भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञान योग
इस पेज पर अध्याय 4 के सभी श्लोक सरल हिंदी व्याख्या सहित पढ़ें। यहाँ प्राचीन योग की परंपरा, उसका लोप और दिव्य ज्ञान का रहस्य समझाया गया है।
गीता 4:2 – जब परंपरा टूटती है
📜 संस्कृत श्लोक
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥
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| जब परंपरा टूटती है, तब ज्ञान धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है |
📖 गीता 4:2 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
इस प्रकार
राजर्षियों ने
इस योग को
गुरु-परंपरा से
प्राप्त किया।
श्रीकृष्ण:
परंतु
लंबे समय के कारण
यह योग लुप्त
हो गया।
अर्जुन:
हे माधव,
क्या दिव्य ज्ञान भी
समय के साथ खो सकता है?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
जब परंपरा टूट जाती है,
तब ज्ञान
धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है।
📜 परंपरा से मिला ज्ञान ही सुरक्षित रहता है
👉 जब गुरु-शिष्य परंपरा टूटती है, तो सत्य भी धुंधला हो जाता है।
🔎 सरल अर्थ
यह योग गुरु-शिष्य परंपरा से राजर्षियों ने जाना। लेकिन समय बीतने के साथ यह ज्ञान लुप्त हो गया।
अर्थात — ज्ञान समाप्त नहीं हुआ, उसकी समझ और अभ्यास कम हो गया।
ज्ञान कैसे खोता है?
ज्ञान एक दीपक की तरह है।
यदि उसे जलाकर आगे न बढ़ाया जाए, तो प्रकाश कम होने लगता है।
जब:
- लोग अभ्यास छोड़ देते हैं,
- सिद्धांत को व्यवहार से अलग कर देते हैं,
- परंपरा केवल शब्द बनकर रह जाती है,
तब ज्ञान धीरे-धीरे प्रभाव खो देता है।
राजर्षि क्यों महत्वपूर्ण हैं?
राजर्षि वह होते थे जो सत्ता और साधना दोनों को संतुलित रखते थे।
वे केवल शासक नहीं, बल्कि अनुशासित और आत्मज्ञानी व्यक्ति थे।
जब नेतृत्व में आध्यात्मिक समझ होती है, तो समाज संतुलित रहता है।
आज के समय में यह कैसे लागू होता है?
आज जानकारी बहुत है, लेकिन अनुभव कम।
लोग पढ़ते बहुत हैं, लेकिन जीते कम हैं।
यही कारण है कि सत्य सिद्धांत होने के बावजूद जीवन में स्थिरता कम दिखाई देती है।
👤 एक सरल उदाहरण
एक स्कूल में वर्षों से एक शिक्षक थे जो बच्चों को केवल पाठ्यक्रम नहीं, चरित्र भी सिखाते थे।
उनके जाने के बाद नई पीढ़ी ने कहा — “अब बस परीक्षा परिणाम मायने रखता है।”
धीरे-धीरे स्कूल की पहचान बदल गई। अंक बढ़े, लेकिन अनुशासन और सम्मान कम हो गया।
सिद्धांत वही थे, लेकिन आत्मा खो गई।
यही गीता 4:2 का संदेश है — ज्ञान तब खोता है जब उसका अभ्यास रुक जाता है।
समय का प्रभाव
“कालेन महता” — समय के साथ।
समय स्वयं दोषी नहीं होता, लेकिन लापरवाही समय को अवसर दे देती है।
यदि हम सचेत रहें, तो परंपरा जीवित रहती है।
केंद्रीय संदेश
ज्ञान पुस्तक में सुरक्षित नहीं रहता, वह जीवन में सुरक्षित रहता है।
जब हम उसे व्यवहार में लाते हैं, तो वह जीवित रहता है। जब केवल उद्धरण बन जाता है, तो प्रभाव खो देता है।
गीता 4:2 हमें चेतावनी देती है — सत्य को केवल सुनो मत, उसे जीते रहो।
📘 भगवद गीता 4:2 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 4:2 में श्रीकृष्ण क्या बताते हैं?
श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह योग राजर्षियों ने गुरु-परंपरा से प्राप्त किया था।
👑 राजर्षि कौन होते हैं?
राजर्षि वे राजा होते हैं जो आध्यात्मिक ज्ञान और धर्म में स्थित रहते हैं।
⏳ यह योग लुप्त क्यों हो गया?
समय के साथ गुरु-शिष्य परंपरा कमजोर हो गई, जिससे यह दिव्य ज्ञान धीरे-धीरे लुप्त हो गया।
📜 गुरु-परंपरा का क्या महत्व है?
गुरु-परंपरा आध्यात्मिक ज्ञान को सुरक्षित रखती है और उसे शुद्ध रूप में आगे बढ़ाती है।
🕊️ गीता 4:2 का मुख्य संदेश क्या है?
जब परंपरा और साधना कमजोर होती है, तो सत्य ज्ञान भी धीरे-धीरे खो जाता है।
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✍️ लेखक के बारे में
Bhagwat Geeta by Sun आधुनिक जीवन में गीता के सिद्धांतों को सरल और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है। यह मंच गीता को जीवन-निर्णय और आत्म-जागरूकता से जोड़ता है।
यह लेख केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।
Bhagavad Gita 4:2 – How Timeless Wisdom Gets Lost Over Time
If spiritual knowledge is eternal, how can it disappear? Bhagavad Gita 4:2 explains why even the greatest wisdom can fade with time.
Bhagavad Gita 4:2 – Shlok
Evaṁ paramparā-prāptam
imaṁ rājarṣayo viduḥ |
Sa kāleneha mahatā
yogo naṣṭaḥ parantapa ||
Explanation
In Bhagavad Gita 4:2, Lord Krishna continues the theme of ancient spiritual transmission. He explains that this yoga was received through a chain of teachers and leaders — a paramparā. Great kings and sages once understood it clearly.
However, over a long period of time, this knowledge became lost. Krishna does not say the truth vanished. Rather, its understanding weakened. When transmission becomes mechanical, when practice is replaced by ritual, or when leadership loses integrity, wisdom slowly fades.
This verse highlights a universal reality: knowledge must be lived to survive. Written words are not enough. When discipline, sincerity, and ethical leadership decline, even powerful teachings lose clarity.
For a modern global audience, this message is highly relevant. In today’s world of rapid information exchange, depth is often replaced by speed. Teachings are shared widely, but not always understood deeply. Bhagavad Gita 4:2 reminds us that preservation requires responsibility.
Real-Life Example
Consider an educational institution that once upheld strong academic values. Over decades, shortcuts increase, standards drop, and reputation declines. The original principles still exist in documents, but their living spirit fades. Revival requires returning to authentic practice. This mirrors the message of Bhagavad Gita 4:2.
The verse teaches that wisdom is sustained not by memory alone, but by disciplined continuation.
Frequently Asked Questions
It explains how spiritual knowledge was passed down through tradition but gradually became lost over time.
A lineage or chain of transmission through teachers and leaders.

Jai Shree Krishna 👏🙏👍✌️👌😘😊🎉
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