Skip to main content

यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

श्रीकृष्ण ने यह योग सबसे पहले किसे सिखाया था? – भगवद गीता 4:1

प्रश्न: गीता 4:1 में श्रीकृष्ण क्या बताते हैं?

उत्तर: गीता 4:1 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्होंने इस अविनाशी योग को प्राचीन काल में सूर्यदेव विवस्वान को सिखाया था। विवस्वान ने इसे मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को बताया। इस प्रकार यह दिव्य ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा से चला आ रहा है।

सत्य बदलता नहीं — लेकिन लोग उसे भूल जाते हैं।

भगवद्गीता अध्याय 4 की शुरुआत किसी दार्शनिक तर्क से नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक घोषणा से होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं — जो ज्ञान मैं तुम्हें दे रहा हूँ, वह नया नहीं है।

वह समय से परे है। वह पीढ़ियों से प्रवाहित है।


📖 भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञान योग

इस पेज पर अध्याय 4 के सभी श्लोक सरल हिंदी व्याख्या सहित पढ़ें। यहाँ प्राचीन योग की परंपरा, उसका लोप और दिव्य ज्ञान का रहस्य समझाया गया है।

गीता 4:1 – योग की दिव्य परंपरा

📜 संस्कृत श्लोक

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥


भगवद गीता 4:1 में श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि उन्होंने यह अविनाशी योग पहले सूर्यदेव (विवस्वान) को सिखाया था। सूर्यदेव ने इसे मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को बताया। यह श्लोक दर्शाता है कि गीता का ज्ञान अत्यंत प्राचीन और सनातन परंपरा से चला आ रहा है।
यह योग अनादि काल से गुरु-परंपरा के माध्यम से चलता आया है


📖 गीता 4:1 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद

श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, मैंने इस अविनाशी योग को प्राचीन काल में विवस्वान (सूर्य देव) को सिखाया था।

श्रीकृष्ण:
विवस्वान ने इसे मनु को बताया, और मनु ने इसे इक्ष्वाकु को सिखाया।

अर्जुन:
हे माधव, क्या यह ज्ञान इतना प्राचीन है?

श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन। यह सनातन योग है, जो गुरु-परंपरा से चलता आया है।


🌞 सनातन योग — परंपरा से चला आ रहा दिव्य ज्ञान

👉 सच्चा ज्ञान समय से परे होता है।

🔎 सरल अर्थ

श्रीकृष्ण कहते हैं — मैंने इस अविनाशी योग को पहले सूर्यदेव को बताया। सूर्यदेव ने इसे मनु को दिया, और मनु ने इसे आगे बढ़ाया।

अर्थात — यह ज्ञान किसी एक व्यक्ति या एक समय का नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा का हिस्सा है।


यह घोषणा इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

यहाँ श्रीकृष्ण एक गहरा संदेश दे रहे हैं।

सत्य ज्ञान अचानक उत्पन्न नहीं होता। वह अनुभव, अनुशासन और परंपरा से सुरक्षित रहता है।

जब ज्ञान सही हाथों में जाता है, तो वह पीढ़ियों तक जीवित रहता है।


आधुनिक जीवन में इसका क्या अर्थ है?

आज के समय में हर चीज़ “नई” होने की होड़ में है। नया ट्रेंड, नई सोच, नया तरीका।

लेकिन जीवन के कुछ सिद्धांत ऐसे हैं जो कभी पुराने नहीं होते — कर्तव्य, सत्य, अनुशासन, संयम।

गीता 4:1 हमें याद दिलाती है — मूल्य बदलते नहीं, लोग उन्हें भूल जाते हैं।


👤 एक छोटा लेकिन गहरा उदाहरण

एक छोटे शहर में एक परिवार था जहाँ दादा जी हमेशा कहते थे — “ईमानदारी सबसे बड़ा धन है।”

उनका बेटा बड़ा होकर व्यापारी बना। कई बार उसे शॉर्टकट लेने का अवसर मिला, लेकिन उसने अपने पिता की सीख नहीं छोड़ी।

धीरे-धीरे उसकी पहचान बन गई — लोग कहते थे, “इनसे काम कराओ, भरोसा मिलेगा।”

फिर अगली पीढ़ी आई। अगर वे कहते — “आज के जमाने में ईमानदारी से कुछ नहीं होता,” तो पूरी विरासत टूट जाती।

लेकिन जब उन्होंने उसी परंपरा को अपनाया, तो केवल व्यवसाय नहीं, सम्मान भी सुरक्षित रहा।

यही गीता 4:1 का सार है — सत्य केवल शब्द नहीं, जीवन की विरासत है।


“विवस्वान” का गहरा संकेत

सूर्य प्रकाश देता है।

श्रीकृष्ण यह संकेत देते हैं कि योग अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाला प्रकाश है।

जैसे सूर्य बिना भेदभाव सबको रोशनी देता है, वैसे ही यह ज्ञान सभी के लिए है।


अध्याय 4 की दिशा

अब प्रश्न उठता है — अगर यह ज्ञान इतना पुराना है, तो फिर लोगों ने इसे कैसे खो दिया?

अध्याय 4 आगे इसी रहस्य को खोलेगा।

यह अध्याय बताएगा:

  • ज्ञान कैसे लुप्त होता है
  • ईश्वर अवतार क्यों लेते हैं
  • कर्म और ज्ञान का संबंध क्या है

केंद्रीय संदेश

सत्य नया नहीं होता। वह सनातन होता है।

जब हम उसे समझकर अपनाते हैं, तो वह जीवित रहता है। जब हम उसे अनदेखा करते हैं, तो वह केवल इतिहास बन जाता है।

गीता 4:1 हमें आमंत्रण देती है — ज्ञान को केवल पढ़ो मत, उसे परंपरा बनाओ।




📘 भगवद गीता 4:1 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

🕉️ गीता 4:1 में श्रीकृष्ण क्या बताते हैं?
श्रीकृष्ण बताते हैं कि उन्होंने इस अविनाशी योग को सबसे पहले विवस्वान (सूर्य देव) को सिखाया था।

🌞 विवस्वान कौन हैं?
विवस्वान सूर्य देव हैं, जिन्हें इस दिव्य योग का प्रथम शिष्य बताया गया है।

📜 गुरु-परंपरा का क्या महत्व है?
इस श्लोक में बताया गया है कि यह ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा से आगे बढ़ता आया है।

⏳ क्या गीता का ज्ञान नया है?
नहीं, यह सनातन और प्राचीन योग है, जो समय से परे है।

🕊️ गीता 4:1 का मुख्य संदेश क्या है?
सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान परंपरा से सुरक्षित रहता है और युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करता है।


🌟 आगे क्या पढ़ें (गीता अध्याय प्रवाह)

⬅️ Previous (अध्याय 3 सार)

कर्मयोग का संपूर्ण सार, निष्काम कर्म, लोकसंग्रह और आत्म-संतुलन की मुख्य शिक्षाओं को एक स्थान पर समझें।

👉 गीता अध्याय 3 – कर्मयोग सारांश
➡️ Next (अध्याय 4 आरंभ)

योग की प्राचीन परंपरा कैसे समय के साथ लुप्त हो गई— इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संदर्भ को जानें।

👉 योग की परंपरा का लोप – गीता 4:2

🌟 देवदत्त – गीता और महाभारत संदर्भ

देवदत्त नाम महाभारत और गीता के प्रसंगों में विशेष महत्व रखता है। यह संग्रह उन सभी श्लोकों और लेखों को एक स्थान पर प्रस्तुत करता है जहाँ देवदत्त का उल्लेख मिलता है।

👉 देवदत्त से जुड़े सभी गीता लेख पढ़ें

✍️ लेखक के बारे में

Bhagwat Geeta by Sun आधुनिक जीवन के संदर्भ में भगवद्गीता के सिद्धांतों को सरल और भावनात्मक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है। यह मंच गीता को केवल धार्मिक पाठ नहीं, बल्कि जीवन-प्रबंधन की मार्गदर्शिका मानता है।


Disclaimer:
यह लेख केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। पाठक अपने विवेक और समझ का प्रयोग करें।


Bhagavad Gita 4:1 – The Ancient Wisdom That Was Never Meant to Be Lost

Is spiritual wisdom something new, or has it existed long before us? Bhagavad Gita 4:1 reveals that true knowledge is timeless.


Bhagavad Gita 4:1 – Shlok (English Letters)

Śrī-bhagavān uvāca |
Imaṁ vivasvate yogaṁ proktavān aham avyayam |
Vivasvān manave prāha manur ikṣvākave ’bravīt ||


Explanation

In Bhagavad Gita 4:1, Lord Krishna begins a new dimension of teaching. He explains that the knowledge of Karma Yoga is not something recently created. It is ancient, eternal wisdom. Krishna says he first taught this yoga to Vivasvan (the sun deity), who passed it to Manu, and then to King Ikshvaku.

This verse establishes continuity. Spiritual truth is not temporary or cultural. It is passed through generations to preserve balance and order in society. Krishna emphasizes that this yoga is avyayam — imperishable.

Why is this important? Because it shows that wisdom survives through responsible transmission. When knowledge is forgotten or misapplied, confusion spreads. Chapter 4 begins by restoring that broken chain.

For a modern global audience, this message is powerful. In an age of fast-changing trends, Bhagavad Gita 4:1 reminds us that foundational truths about discipline, responsibility, and self-mastery do not expire. They only need to be remembered.

Real-Life Example

Consider a family business in Europe that follows ethical principles passed down for generations. While markets change, core values remain steady. When those values are ignored, the company loses direction. When preserved, stability returns. This mirrors the message of Bhagavad Gita 4:1 — wisdom sustains order when transmitted faithfully.

The verse teaches that true knowledge is not invented. It is rediscovered and responsibly carried forward.


Frequently Asked Questions

What is the main message of Bhagavad Gita 4:1?

It teaches that the yoga of action is ancient and was passed down through generations.

Who was Vivasvan?

He is described as the sun deity, the first recipient of this knowledge.

Why is the teaching called imperishable?

Because its principles remain valid across time.

Why is this verse relevant today?

It reminds us that timeless values are essential for stability in changing societies.

What theme does Chapter 4 introduce?

The restoration and deeper explanation of eternal spiritual knowledge.

Comments