Skip to main content

Posts

Showing posts from October, 2025

यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 16

भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 16 श्लोक: नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।। 🔹 हिंदी अनुवाद : असत (जो अस्तित्वहीन है) का कभी अस्तित्व नहीं होता, और सत (जो सदा विद्यमान है) का कभी अभाव नहीं होता। इन दोनों का यह निष्कर्ष तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है। 🌼 विस्तृत व्याख्या : भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि — 👉 जो चीज़ अस्थायी (नाशवान) है, उसका अस्तित्व सदा नहीं रहता। जैसे — शरीर, वस्तुएँ, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु — ये सब परिवर्तनशील हैं। 🕰️ एक समय आते हैं और एक दिन समाप्त हो जाते हैं। 👉 वहीं जो चीज़ सत्य और शाश्वत (अविनाशी) है, उसका कभी नाश नहीं होता। यह “आत्मा ” है — जो न जन्म लेती है, न मरती है, वह सदा विद्यमान रहती है। ✨ 🪶 उदाहरण : जैसे बादल आते-जाते रहते हैं ☁️, लेकिन आकाश हमेशा बना रहता है 🌌। उसी प्रकार शरीर और संसार की चीज़ें आती-जाती हैं, परंतु आत्मा सदा रहती है — वह सच्चा "सत्" है। 🙏 💫 ...

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 15

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 15 📜 श्लोक 2.15 यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।।            🌼 हिंदी अनुवाद : हे अर्जुन! हे श्रेष्ठ पुरुष! जिसे ये (सुख-दुःख, शीत-उष्ण आदि द्वंद्व) विचलित नहीं करते, जो सुख और दुःख में समान रहता है, वह धीर पुरुष अमरत्व (मोक्ष) के योग्य होता है। ✨ 🌺 विस्तृत व्याख्या : भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं 👇 🪷 1. जीवन में सुख और दुःख दोनों आते हैं: संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे केवल सुख या केवल दुःख मिले। दोनों का आना स्वाभाविक है — जैसे दिन के बाद रात आती है। 🌞🌙 🪷 2. जो व्यक्ति इनसे प्रभावित नहीं होता: जो व्यक्ति इन परिस्थितियों में अपने मन को स्थिर रखता है — न अत्यधिक प्रसन्न होता है, न ही अत्यधिक दुःखी — वही सच्चा धीर (अडिग) व्यक्ति कहलाता है। 💪🧘‍♂️ 🪷 3. धैर्य और समता का महत्व: सुख और दुःख में समान रहना, यानी दोनों को ईश्वर की लीला मानकर स्वीकार करना, मोक्ष की ओर पहला कदम है। 🙏 🪷 4. अमृतत्व (मोक्ष) की प्राप्ति: ऐसे...

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 14

  भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 14                            🌿 श्लोक 2.14          मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।         आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥ 🕉️ हिंदी अनुवाद हे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)! इन्द्रियों के विषयों के संपर्क से शीत (ठंड) और उष्ण (गर्मी), सुख और दुःख की अनुभूति होती है। वे सब आते-जाते हैं, अनित्य (स्थायी नहीं) हैं। इसलिए हे भारत! तू उन्हें सहन कर। 📖 विस्तृत व्याख्या  भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि — जीवन में सुख-दुःख, लाभ-हानि, ठंड-गर्मी, मान-अपमान जैसी सभी स्थितियाँ अस्थायी हैं। ये केवल हमारे इन्द्रियों और बाहरी वस्तुओं के संपर्क से उत्पन्न होती हैं। जैसे सर्दी में ठंड लगती है और गर्मी में गर्मी — पर ये दोनों ही थोड़े समय के लिए होते हैं। इसी प्रकार, जीवन में आने वाले सुख...

भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 13

भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 13 🕉️ श्लोक 2.13 देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥ 🌼 हिंदी अनुवाद : जैसे इस शरीर में आत्मा बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त होती रहती है, उसी प्रकार मृत्यु के पश्चात वह आत्मा एक नए शरीर को प्राप्त करती है। इस परिवर्तन से ज्ञानी व्यक्ति विचलित या दुखी नहीं होता। 🌿 भावार्थ : भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को जीवन और मृत्यु का गहरा सत्य सिखा रहे हैं। अर्जुन युद्धभूमि में अपने प्रियजनों को देखकर दुखी और मोहग्रस्त था। तब श्रीकृष्ण कहते हैं — “हे अर्जुन! तुम जिनके मरने का शोक कर रहे हो, वे वास्तव में मर नहीं सकते, क्योंकि आत्मा अमर है।” 🔱 विस्तृत व्याख्या : 1️⃣ शरीर परिवर्तनशील है, आत्मा नहीं मनुष्य का शरीर समय के साथ बदलता है — पहले बचपन, फिर युवावस्था, और फिर बुढ़ापा आता है। लेकिन क्या “मैं” बदलता हूँ? नहीं। जो “मैं” बचपन में था, वही “मैं” आज वृद्धावस्था में हूँ। इससे स्पष्ट होता है कि शरीर बदलता है पर आत्मा वही रहती है। 2️⃣ मृत्यु केवल शरीर...

भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 12

✨ भगवद गीता अध्याय 2, श्लोक 1 2✨                        (श्री भगवान बोले ) 🕉️ श्लोक न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः। न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥ 💫 हिन्दी अनुवाद: न तो ऐसा कभी हुआ है कि मैं नहीं था, न तुम थे, और न ये राजा थे — और न ही आगे कभी ऐसा होगा कि हम सब नहीं रहेंगे। 🌻 श्लोक का भावार्थ : श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं — हे अर्जुन! तू यह मत समझ कि मृत्यु के बाद सबका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। मैं, तुम, और ये सब राजा — सब पहले भी थे, अब भी हैं, और आगे भी रहेंगे। आत्मा कभी नष्ट नहीं होती, वह केवल शरीर बदलती है। शरीर मरता है, पर आत्मा अमर है। विस्तृत भावार्थ : यह श्लोक आत्मा की अमरता  का गहरा संदेश देता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि — 1. आत्मा कभी जन्म नहीं लेती और कभी मरती नहीं। यह अनादि (शुरुआत से पहले की) और अनन्त (कभी समाप्त न होने व...

✨ भगवद गीता अध्याय 2, श्लोक 11 ✨

  ✨ भगवद गीता अध्याय 2, श्लोक 1 1✨ (श्री भगवान बोले ) 🕉️ श्लोक श्रीभगवान उवाच: – अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासु च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥ 💫 हिन्दी अनुवाद: भगवान कहते हैं: “हे अर्जुन! तुम शोक क्यों कर रहे हो? तुम जो कहना चाहते हो वह ज्ञान से नहीं हो रहा। जो व्यक्ति ज्ञानी होता है, वह इस संसार में मृतकों के लिए शोक नहीं करता और न ही भविष्य के लिए चिंता करता है।” विस्तृत भावार्थ : 1. अशोच्यान् : ‘अ’ का अर्थ है नकार, और ‘शोच्य’ का अर्थ है शोक करने योग्य। अर्थात, “जिसके लिए शोक करना उचित नहीं है।” अर्जुन जिस कारण से शोक कर रहे हैं, वह गलत है, क्योंकि मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा अमर है। 2. अन्वशोचः : ‘अन्व’ का अर्थ है ‘परंतु’, ‘शोकः’ का अर्थ है दुःख। “तुम जो शोक कर रहे हो, वह अनुचित है।” - 3. त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे: अर्जुन ज्ञान के आधार पर बोल रहे हैं, लेकिन उनका ज्ञान अपूर्ण है। वे केवल शरीर की मृत्यु और युद्ध के भय में डूबे हुए हैं। 4. गतासूनगता...

✨ भगवद गीता अध्याय 2, श्लोक 10 ✨🌸

✨ भगवद गीता अध्याय 2, श्लोक 10 ✨🌸 ( श्रीकृष्ण का ज्ञान प्रारंभ होने से पहले का सुंदर दृश्य ) 🕉️ श्लोक तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥ दुर्योधन अपनी सेना की रणनीति और भीष्म पितामह की भूमिका को स्पष्ट करता है। गीता 1:10 – दुर्योधन का भय “भीष्म द्वारा संरक्षित हमारी सेना सीमित प्रतीत होती है, जबकि भीम द्वारा संरक्षित पांडवों की सेना अधिक शक्तिशाली लगती है।” यह श्लोक दुर्योधन के मन का सत्य उजागर करता है — धर्म और विश्वास के बिना शक्ति अधूरी होती है। 💫 हिन्दी अनुवाद: इस प्रकार करुणा से अभिभूत, आँसुओं से भरी हुई आँखों वाले, शोक से पीड़ित अर्जुन से मधुसूदन श्रीकृष्ण ने यह वचन कहा। 🙏🌿 � � विस्तृत भावार्थ : यह श्लोक गीता के अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण का वर्णन करता है — युद्धभूमि में अर्जुन पूर्ण रूप से निराश हो चुके हैं 😔। उनका मन करुणा से भरा हुआ है 💧, आँखें आँसुओं से नम हैं 😢, और उनके विचारों में केवल एक ही द्वंद्व है — “अपने ही स्वजनों को कैस...

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 9

             🕉️ भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 9 🕉️               ✨ "शिष्यः अर्जुन का आत्मसमर्पण" ✨ 📜 श्लोक 2.9  : सञ्जय उवाच — एवम् उक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः। न योत्स्य इति गोविन्दम् उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥                                  गीता 2:9  💬 हिंदी अनुवाद : संजय ने कहा — इस प्रकार कहकर, नींद को जीतने वाले गुडाकेश (अर्जुन) ने, हे परंतप (धृतराष्ट्र)! हृषीकेश (श्रीकृष्ण) से कहा — “मैं युद्ध नहीं करूंगा।” यह कहकर वे मौन हो गए। 🤫⚔️ --------------------------------------------------- 🌼 विस्तृत व्याख्या : 👉 इस श्लोक में अर्जुन की मनःस्थिति को दर्शाया गया है। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि अब वे युद्ध नहीं करेंगे। 🛑 💔 अर्जुन के हृदय में दया, मोह और परिवार के प्रति लगाव था — वे सोच रहे थे कि अपने ही भाइयों, गुरुओं और संबंधियों का वध कैसे करें? इस मानसिक द्वंद्व में वे असमंजस में पड़ गए और युद्ध ...

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 8

      🌸 भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 8 🌸            (अर्जुन की असहाय स्थिति 😔) 🕉️ श्लोक 2.8 न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥                                     गीता 2:8 ✨ हिंदी अनुवाद: हे कृष्ण! 😞 मैं नहीं देखता कि यह शोक, जो मेरे इन्द्रियों को सुखा रहा है, मेरे हृदय से कैसे दूर होगा — चाहे मुझे इस पृथ्वी पर निष्कण्टक राज्य ही क्यों न मिल जाए, या स्वर्ग में देवताओं के समान ही प्रभुता क्यों न प्राप्त हो जाए। 👑 --------------------------------------------------- 💭 भावार्थ : अर्जुन अत्यधिक दुखी और निराश हैं 😢। वह श्रीकृष्ण से कहते हैं कि उनका मन इतना शोक से भरा है कि उन्हें कोई उपाय नहीं दिख रहा जिससे यह दुख दूर हो सके। यहाँ तक कि यदि उन्हें पृथ्वी पर अथवा स्वर्ग में सबसे बड़ा राज्य भी मिल जाए, तब भी यह पीड़ा समाप्त नहीं होगी। 💔 यह श्लोक अर्जुन की आत्मिक उलझन...

भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 7

               भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 7 कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।                                गीता 2:7  🕉️ हिंदी अनुवाद: मेरी स्वभाव (धर्मबुद्धि) कायरता रूप दोष से ढक गई है और मैं धर्म के विषय में मोहग्रस्त हो गया हूँ। इसलिए हे कृष्ण! मैं आपसे पूछता हूँ कि मेरे लिए क्या निश्चित रूप से श्रेयस्कर (कल्याणकारी) है — कृपया मुझे स्पष्ट रूप से बताइए। अब मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ, कृपया मुझे उपदेश दीजिए। --------------------------------------------------- 💫 विस्तृत व्याख्या : इस श्लोक में अर्जुन अपनी मानसिक स्थिति को पूरी तरह से प्रकट करता है। युद्धभूमि में खड़े होकर वह समझ जाता है कि उसकी बुद्धि भ्रमित हो गई है — उसे समझ नहीं आ रहा कि धर्म क्या है और अधर्म क्या। वह कहता है कि “मेरे स्वभाव पर दया और कायरता हावी हो गई है,” यानी अर्जुन...

भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 6

               भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 6 न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः। यानेव हत्वा न जिजीविषामः तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥                                 गीता 2:6      🕉 हिंदी अनुवाद: हमें यह भी नहीं पता कि हमारे लिए क्या अच्छा है — हम जीतेंगे या वे जीतेंगे। जिन्हें मारकर हम जीना नहीं चाहते, वे ही हमारे सामने खड़े हैं — धृतराष्ट्र के पुत्र। --------------------------------------------------- 📖 विस्तार से व्याख्या: इस श्लोक में अर्जुन का मन पूरी तरह से संशय और दुविधा से भरा हुआ है। वह युद्धभूमि में खड़ा होकर सोच रहा है कि — > “अगर हम जीत भी गए, तो क्या फायदा? हमारे ही बंधु, गुरु और मित्र मारे जाएंगे। और यदि हम हार गए, तो सब कुछ खो जाएगा।” अर्जुन के मन में कर्तव्य और करुणा के बीच संघर्ष है। वह सोच रहा है कि — अगर हम उन्हें मारेंगे तो पाप लगेगा। अगर हम नहीं मारेंगे तो धर्म और न्याय का नाश हो जाएगा। इस...

📖 भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 5 भावार्थ | युद्ध या भिक्षा का द्वंद्व

सम्मान या करुणा—किसे चुनें? अर्जुन कहते हैं कि गुरुओं को मारकर मिला राज्य भी व्यर्थ है। यह श्लोक जीवन के उस क्षण को दर्शाता है, जब सफलता भी बोझ लगने लगती है।             📖 भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 5 श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके हत्वार्थकामांस्तु गुरुन्निहत्य। भोज्यां भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् हत्वा सुखं मां प्रति लोकेऽह्यनार्हाः।। अर्जुन कहते हैं कि गुरुजनों को मारकर राज्य भोगने से बेहतर है भिक्षा पर जीवन बिताना। गीता 2:5 – त्याग की गलत समझ अर्जुन बोले — “ऐसे महान गुरुओं को मारकर इस संसार में भोग भोगने से अच्छा है कि मैं भिक्षा पर जीवन बिताऊँ।” यह श्लोक अर्जुन की करुणा को दिखाता है, लेकिन साथ ही यह भी बताता है कि भावनात्मक त्याग सदैव सही निर्णय नहीं होता। यहीं से श्रीकृष्ण के उपदेशों की वास्तविक शुरुआत होती है।                                  गीता  2:5 हिन्दी अनुवाद: इस संसार में भिक्षा मांगकर भोजन करना भी उन गुरुज...

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 4 व्याख्या | गुरुजनों पर शस्त्र उठाने का संकट

जब तर्क भावनाओं से हार जाए। अर्जुन अपने प्रियजनों के विरुद्ध युद्ध को पाप मानते हैं। यह श्लोक मानवीय संवेदनाओं को दर्शाता है, जहाँ सही और गलत के बीच मन उलझ जाता है।                भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 4 अर्जुन उवाच — कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।। गीता 2:4 – अर्जुन की दुविधा अर्जुन बोले — “हे मधुसूदन! मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण जैसे पूज्य गुरुओं पर बाण कैसे चला सकता हूँ?” अर्जुन का प्रश्न उसके नैतिक संघर्ष को दर्शाता है। उसके लिए यह केवल युद्ध नहीं, बल्कि गुरु-सम्मान और कर्तव्य के बीच का द्वंद्व है।                                     गीता 2:4 हिंदी अनुवाद: अर्जुन ने कहा — हे मधुसूदन! हे अरिसूदन! मैं युद्धभूमि में भीष्म और द्रोण जैसे पूज्यनीय व्यक्तियों पर बाणों से कैसे प्रहार करूं? --------------------------------------------------- विस्तार से अर्थ ...

भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 3 अर्थ हिंदी | कायरता त्यागने का संदेश

उठो, स्वयं को पहचानो। श्रीकृष्ण अर्जुन को चेतावनी देते हैं कि यह कमजोरी उसे शोभा नहीं देती। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि आत्मसम्मान और कर्तव्य से ही जीवन में स्पष्टता आती है।               भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 3 क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप॥                                           श्रीकृष्ण अर्जुन को हृदय की कमजोरी छोड़कर उठ खड़े होने और अपने कर्तव्य का पालन करने का संदेश देते हैं। 🎬 Watch on YouTube Shorts गीता 2:3 – कायरता का त्याग श्रीकृष्ण आगे कहते हैं — “हे पार्थ! इस क्षुद्र हृदय की दुर्बलता को त्याग दो। उठो और शत्रुओं का सामना करो।” यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को उसकी आंतरिक शक्ति का स्मरण कराते हैं। वे बताते हैं कि अर्जुन का वास्तविक स्वरूप भय नहीं, बल्कि साहस और कर्तव्य है। हिंदी अनुवाद: हे अर्जुन! यह नपुंसकता तुझ पर शोभा...

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 2 भावार्थ | अर्जुन का मोह और कमजोरी

क्या यह दुर्बलता है या भ्रम? श्रीकृष्ण अर्जुन से प्रश्न करते हैं कि यह मोह और कायरता कहाँ से आई। यह श्लोक आत्मविश्लेषण सिखाता है—क्या हम सच में दयालु हैं या केवल डर से भाग रहे हैं?                   भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 2 श्रीभगवानुवाच — कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥ श्रीकृष्ण अर्जुन से पूछते हैं कि संकट की घड़ी में यह दुर्बलता और मोह उसे कैसे घेर लिया । गीता 2:2 – अर्जुन को झकझोरता प्रश्न श्रीकृष्ण बोले — “हे अर्जुन! इस संकट के समय तुम्हें यह मोह कहाँ से आ गया? यह न तो आर्यों के योग्य है, न स्वर्ग दिलाने वाला और न यश बढ़ाने वाला।” कृष्ण अर्जुन को झकझोरते हैं, क्योंकि कभी-कभी करुणा के साथ सत्य का कठोर स्मरण भी आवश्यक होता है। वे स्पष्ट करते हैं कि यह भाव दुर्बलता का प्रतीक है।                                      गीता 2:2   हिन्दी अनुवाद : भगवान श्री...

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 1 अर्थ हिंदी | श्रीकृष्ण का प्रथम उपदेश

जहाँ करुणा और ज्ञान एक साथ प्रकट होते हैं। अर्जुन की मानसिक स्थिति देखकर श्रीकृष्ण मौन तोड़ते हैं। यह श्लोक दर्शाता है कि जब मन टूटता है, तभी सच्चे मार्गदर्शक का ज्ञान जीवन को नई दिशा देता है।               भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 1 सञ्जय उवाच — तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥ युद्धभूमि में शोक और करुणा से भरे अर्जुन को देखकर भगवान श्रीकृष्ण उन्हें उपदेश देना प्रारंभ करते हैं। गीता 2:1 – करुणा से भरे श्रीकृष्ण संजय बोले — “इस प्रकार विषाद से ग्रस्त अर्जुन को देखकर, करुणा से भरे श्रीकृष्ण ने उससे ये वचन कहे।” इस श्लोक में श्रीकृष्ण का स्वर कठोर नहीं, बल्कि करुणामय है। वे अर्जुन की कमजोरी को दोष नहीं मानते, बल्कि उसे समझकर सही मार्ग दिखाने के लिए तैयार होते हैं।                                    गीता 2:1   भावार्थ संजय ने कहा — उस समय करुणा से व्याप्त, आँसुओं से भरी आ...

भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 47

                    भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 47 संजय उवाच — एवमुक्त्वोऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥ 47॥                               गीता 1:47   हिंदी अनुवाद : संजय बोले — इस प्रकार कहकर शोक से अत्यन्त व्याकुल चित्तवाले अर्जुन ने रणभूमि में अपना धनुष-बाण त्याग दिया और रथ के पिछले भाग में बैठ गए। ------------------------------------------------------------------------ श्लोक का सारांश / व्याख्या : इस श्लोक में संजय ने धृतराष्ट्र को बताया कि जब अर्जुन ने अपने सगे-संबंधियों को युद्धभूमि में अपने सामने खड़ा देखा, तो उसका मन करुणा और दुःख से भर गया। उन्होंने कृष्ण से कहा कि वे युद्ध नहीं करेंगे, और यह कहकर अपना धनुष और बाण नीचे रख दिए। अब अर्जुन की मानसिक अवस्था अत्यंत विचलित हो गई थी — वह धर्म, कर्तव्य और मोह के बीच फँस गया था। यह अध्याय — "अर्जुन विषाद योग"  — इसी स्थिति पर समाप्त होता है, जहाँ अर्जुन का मन ...

भगवद् गीता अध्याय 1 श्लोक 46

            भगवद् गीता अध्याय 1 श्लोक 46 संजय उवाच । एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ 1.46 ॥                                  गीता 1:46 हिन्दी अनुवाद : संजय ने कहा — इस प्रकार कहकर शोक और करुणा से व्याकुल चित्त वाले अर्जुन ने रणभूमि में अपना धनुष-बाण त्याग दिया और रथ के पिछले भाग में बैठ गए। --------------------------------------------------- शब्दार्थ: एवम् उक्त्वा — इस प्रकार कहकर अर्जुनः — अर्जुन ने संख्ये — युद्धभूमि में रथ-उपस्थे — रथ के पिछले भाग में उपाविशत् — बैठ गए विसृज्य — त्याग कर स-शरं चापं — बाण सहित धनुष को शोक-संविग्न-मानसः — शोक से व्याकुल चित्त वाला ------------------------------------------------------------------ भावार्थ (विस्तार से): जब अर्जुन ने अपने स्वजनों को मारने की इच्छा से इंकार कर दिया और करुणा से भर गए, तब वे अत्यन्त दुःख और शोक से व्याकुल हो उठे। उन्होंने अपना धनुष-बाण नीचे रख दिया और यु...

भगवद गीता, अध्याय 1, श्लोक 45

        भगवद गीता, अध्याय 1, श्लोक 45 अस्माकं तु विशिष्टाः ये तान्निबोध द्विजोत्तम। नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते।।                                गीता 1:45 संदर्भ और विवरण यह श्लोक कुरुक्षेत्र युद्ध के पूर्व भाग में आता है। अर्जुन अपने सारथी श्रीकृष्ण से संवाद कर रहे हैं। युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन को अपनी सेना के बल, श्रेष्ठ योद्धाओं और उनके सेनाध्यक्षों के बारे में पूरी जानकारी देने की आवश्यकता महसूस होती है। अर्जुन कह रहा है कि “हे कृष्ण! हमारे युद्ध में कुछ ऐसे योद्धा हैं जो विशेष रूप से वीर, निपुण और महत्वपूर्ण हैं। मैं उनका परिचय आपको बताऊँगा, ताकि आप मेरी सेना की ताकत और रणनीति समझ सको।” यह श्लोक इस बात को भी दर्शाता है कि युद्ध में योजना और ज्ञान कितना महत्वपूर्ण है। अर्जुन अपने वरिष्ठ सारथी श्रीकृष्ण को पूरी स्थिति स्पष्ट करना चाहता है, ताकि युद्ध के दौरान कोई भ्रम न हो। ------------------------------------------------------------------------ शब्द-श...

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 44

        श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 44 उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥१.४४॥                             गीता 1:44 हिंदी अनुवाद जनार्दन! जिन मनुष्यों के कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उनका अनिश्चितकाल तक नरक में निवास होता है — ऐसा हमने सुना है। --- शब्दार्थ : उत्सन्न-कुल-धर्माणाम् — जिनके कुलधर्म नष्ट हो गए हैं मनुष्याणाम् — उन मनुष्यों का जनार्दन — हे भगवान श्रीकृष्ण नरके — नरक में अनियतं — अनिश्चित या दीर्घकाल तक वासः — निवास या रहना भवति — होता है इति — ऐसा अनुशुश्रुम — हमने सुना है --- भावार्थ : अर्जुन श्रीकृष्ण से कह रहे हैं — “हे जनार्दन! जब किसी परिवार का धर्म और परंपरा नष्ट हो जाती है, तो उस कुल के लोगों का पतन होता है। हमने सुना है कि ऐसे लोग नरक में अनिश्चित समय तक दुःख भोगते हैं।” --- विस्तृत व्याख्या: इस श्लोक में अर्जुन यह बताना चाहते हैं कि युद्ध करने से न केवल लोगों की हत्या होगी बल्कि उनके कुलधर्म (परिवार की धार्मिक परंपराएँ, संस...

भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 43

         भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 43 दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः। उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥                                गीता 1:43 🔹 शब्दार्थ : दोषैः — दोषों से, पापों से एतैः — इनसे कुलघ्नानाम् — कुल का नाश करने वालों के वर्णसङ्करकारकैः — वर्णसंकर (जाति-मिश्रण) उत्पन्न करने वाले उत्साद्यन्ते — नष्ट हो जाते हैं जातिधर्माः — जाति (समाज) के धर्म कुलधर्माः — कुल (परिवार) के धर्म शाश्वताः — सदा से चले आ रहे (स्थायी) --- 🔹 श्लोक का सरल हिन्दी अनुवाद: इन कुल का नाश करने वालों के द्वारा उत्पन्न हुए वर्णसंकर रूप दोषों से जाति के धर्म और कुल के शाश्वत धर्म नष्ट हो जाते हैं। --- 🔹 विस्तृत भावार्थ  : अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से कह रहे हैं कि — जब कोई युद्ध के कारण अपने ही परिवार (कुल) का विनाश कर देता है, तो उसके परिणाम बहुत भयानक होते हैं। ऐसा करने वालों से उत्पन्न हुए “वर्णसंकर” (मिश्रित जातियाँ) समाज में फैल जाती हैं। यह वर्णसंकरता धर्म, स...

भगवद् गीता अध्याय 1 श्लोक 42

            भगवद् गीता अध्याय 1 श्लोक 42 सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ 1.42॥                              गीता 1:42    🕉️ हिन्दी अनुवाद: वंश का नाश करने वाले और जिनके वंश का नाश हो जाता है, वे दोनों ही नरक को प्राप्त होते हैं, क्योंकि उनके पितर (पूर्वज) भी पिण्डदान और जल अर्पण की क्रिया से वंचित हो जाते हैं। --- 📖 विस्तृत अर्थ: इस श्लोक में अर्जुन यह कह रहे हैं कि — जब किसी कुल (परिवार या वंश) का नाश होता है, तब कुल-धर्म नष्ट हो जाता है। कुल-धर्म नष्ट होने से समाज में अधर्म बढ़ जाता है। ऐसे में न केवल वर्तमान पीढ़ी, बल्कि पूर्वज भी दुखी होते हैं, क्योंकि उन्हें श्राद्ध, पिण्डदान और तर्पण आदि धार्मिक क्रियाएं नहीं मिल पातीं। इससे वे स्वर्ग से पतित होकर नरक में चले जाते हैं। अर्थात, अर्जुन यह समझा रहे हैं कि युद्ध करने से न केवल जीवित लोगों को हानि होगी, बल्कि पूर्वजों की आत्माओं को भी कष्ट पहुँचेगा। इसलिए युद्ध...

भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 41

             भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 41 संस्कृत श्लोक: अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः।। 41।।                                 गीता 1:41 --- 🕉️ शब्दार्थ : अधर्माभिभवात् — अधर्म की वृद्धि से, जब धर्म का नाश होता है कृष्ण — हे कृष्ण! प्रदुष्यन्ति — भ्रष्ट हो जाती हैं कुल-स्त्रियः — कुल की स्त्रियाँ (परिवार की महिलाएँ) स्त्रीषु दुष्टासु — जब स्त्रियाँ दुष्ट या पतित हो जाती हैं वार्ष्णेय — हे वार्ष्णेय (वृष्णिवंशी कृष्ण) जायते — उत्पन्न होता है वर्णसङ्करः — वर्णसंकर (जाति-मिश्रण, अर्थात सामाजिक व्यवस्था का पतन) --- 🌼 हिंदी अनुवाद: हे कृष्ण! जब अधर्म का प्रबल प्रभाव बढ़ जाता है, तब कुल की स्त्रियाँ भ्रष्ट हो जाती हैं, और जब स्त्रियाँ भ्रष्ट हो जाती हैं तो समाज में वर्णसंकर (जातियों का मिश्रण, सामाजिक अव्यवस्था) उत्पन्न हो जाता है। --- 🕉️ विस्तृत व्याख्या : यह श्लोक अर्जुन के मन के गहरे नैतिक और सामाजिक द्...