भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 32 ⭐ श्लोक 32 यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥ अर्जुन और धर्मयुद्ध: गीता 2.32 का दिव्य संदेश श्लोक का सरल अर्थ हे अर्जुन! ऐसा धर्मयुक्त युद्ध, जो अपने-आप प्राप्त हुआ है और मनुष्य के लिए स्वर्ग के द्वार को खोल देता है, वह सौभाग्यशाली क्षत्रिय योद्धाओं को ही मिलता है। ऐसा अवसर अत्यंत दुर्लभ, पवित्र और कर्म–मार्ग में श्रेष्ठ माना जाता है। ⭐ युद्ध का संकल्प या धर्म का संकल्प — अर्जुन का द्वंद्व भगवद् गीता के दूसरे अध्याय में जब अर्जुन मोह और शोक से ग्रस्त होकर अपना धनुष नीचे रख देते हैं, तब श्रीकृष्ण उन्हें कर्तव्य की याद दिलाते हैं। धर्मयुद्ध कुरुक्षेत्र केवल दो परिवारों का संघर्ष नहीं था; यह अधर्म और धर्म के बीच निर्णायक टकराव था। अर्जुन सोचते हैं कि सामने गुरु, चाचा, भाई, रिश्तेदार, और मित्र खड़े हैं — इन्हें मारकर भला मुझे क्या मिलेगा? परिवार का नाश, कुल का पतन, समाज का अव्यवस्था, यह सब भय अर्जुन के हृदय में उमड़ रहा था। इसीलिए श्रीकृष्ण उन्हें कर्तव्य का स्म...