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Showing posts from December, 2025

यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

भगवद् गीता अध्याय 2 , श्लोक 62 – कामना से क्रोध और बुद्धि का नाश | गीता का गूढ़ ज्ञान

मन किन विचारों में उलझता है और वही पतन की शुरुआत कैसे बनता है? गीता 2:62 बताती है कि विषयों का चिंतन आसक्ति को जन्म देता है, और यही आसक्ति आगे चलकर मनुष्य को भ्रमित करती है। भगवद गीता 2:62 ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते। संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब मनुष्य बार-बार विषयों का चिंतन करता है, तो उससे कामना उत्पन्न होती है।कामना पूरी न होने पर क्रोध आता है, और क्रोध से विवेक व बुद्धि नष्ट हो जाती है। 📖 गीता 2:62 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद अर्जुन: हे श्रीकृष्ण, मनुष्य का पतन कैसे प्रारंभ होता है? एक छोटा-सा विचार पूरे जीवन को कैसे बिगाड़ देता है? श्रीकृष्ण: हे अर्जुन, जब मनुष्य बार-बार विषयों का चिंतन करता है, तो उसके भीतर पहले आसक्ति उत्पन्न होती है। अर्जुन: केवल सोचने से ही, हे केशव? यदि कर्म न भी किया जाए? श्रीकृष्ण: हाँ अर्जुन। आसक्ति से कामना (इच्छा) जन्म लेती है, और जब वह इच्छा पूर्ण नहीं होती, तो क्रोध उत्पन्न होता है। अर्जुन: फिर क्रोध मनुष्य को कहाँ ले जाता है, हे माधव? श्रीकृष्ण: क्र...

भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 61- इंद्रिय संयम और स्थिर बुद्धि का रहस्य

क्या इंद्रियों पर नियंत्रण पाए बिना मन को स्थिर किया जा सकता है? क्या केवल ज्ञान से जीवन में शांति संभव है? गीता 2:61 में श्रीकृष्ण इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर देते हैं और बताते हैं कि जो व्यक्ति अपनी सभी इंद्रियों को संयम में रखकर मन को ईश्वर में स्थिर करता है, वही वास्तव में स्थिर बुद्धि वाला होता है। भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 61 तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि जो व्यक्ति अपनी सभी इंद्रियों को संयम में रखकर मन को ईश्वर में स्थिर करता है, वही वास्तव में स्थिर बुद्धि वाला होता है और जीवन में शांति प्राप्त करता है। गीता 2:61 के बाद अर्जुन और श्रीकृष्ण का संवाद अर्जुन: हे श्रीकृष्ण, यदि इंद्रियाँ इतनी बलवान हैं, तो मनुष्य उन्हें कैसे वश में कर सकता है? श्रीकृष्ण: अर्जुन, जो साधक सभी इंद्रियों को संयम में रखकर मन को मुझमें स्थिर कर देता है, वही स्थिर बुद्धि वाला कहलाता है। श्रीकृष्ण: जिसके इंद्रियाँ नियंत्रण में होती हैं, उसकी बुद्धि डगमगाती नहीं। वही जी...

भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 60 – चंचल इंद्रियाँ कैसे मन को विचलित करती हैं | श्रीकृष्ण उपदेश

क्या ज्ञान होने के बाद भी मन भटक सकता है? भगवद गीता 2:60 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि चंचल इंद्रियाँ विवेकशील व्यक्ति के मन को भी बलपूर्वक विचलित कर सकती हैं। यह श्लोक आधुनिक जीवन की मानसिक अशांति, डिजिटल आकर्षण और आत्मसंयम की चुनौती को गहराई से उजागर करता है। भगवद गीता अध्याय 2, श्लोक 60 यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥ श्रीकृष्ण बताते हैं कि इंद्रियाँ स्वभाव से अत्यंत बलवान होती हैं और वे विवेकशील मनुष्य के मन को भी विचलित कर सकती हैं। इसलिए साधक को निरंतर अभ्यास और संयम द्वारा मन को नियंत्रित करना चाहिए। गीता 2:60 के बाद अर्जुन और श्रीकृष्ण का संवाद अर्जुन: हे श्रीकृष्ण, आप कहते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति भी अपनी इंद्रियों पर पूरा नियंत्रण नहीं रख पाता। तो फिर साधक अपने मन को कैसे संभाले? श्रीकृष्ण: अर्जुन, इंद्रियाँ स्वभाव से चंचल और बलवान होती हैं। वे विवेकशील मनुष्य के मन को भी बलपूर्वक विचलित कर सकती हैं। श्रीकृष्ण: इसलिए केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है। ...