मन किन विचारों में उलझता है और वही पतन की शुरुआत कैसे बनता है? गीता 2:62 बताती है कि विषयों का चिंतन आसक्ति को जन्म देता है, और यही आसक्ति आगे चलकर मनुष्य को भ्रमित करती है। भगवद गीता 2:62 ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते। संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब मनुष्य बार-बार विषयों का चिंतन करता है, तो उससे कामना उत्पन्न होती है।कामना पूरी न होने पर क्रोध आता है, और क्रोध से विवेक व बुद्धि नष्ट हो जाती है। 📖 गीता 2:62 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद अर्जुन: हे श्रीकृष्ण, मनुष्य का पतन कैसे प्रारंभ होता है? एक छोटा-सा विचार पूरे जीवन को कैसे बिगाड़ देता है? श्रीकृष्ण: हे अर्जुन, जब मनुष्य बार-बार विषयों का चिंतन करता है, तो उसके भीतर पहले आसक्ति उत्पन्न होती है। अर्जुन: केवल सोचने से ही, हे केशव? यदि कर्म न भी किया जाए? श्रीकृष्ण: हाँ अर्जुन। आसक्ति से कामना (इच्छा) जन्म लेती है, और जब वह इच्छा पूर्ण नहीं होती, तो क्रोध उत्पन्न होता है। अर्जुन: फिर क्रोध मनुष्य को कहाँ ले जाता है, हे माधव? श्रीकृष्ण: क्र...