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Showing posts from January, 2026

यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

ज्ञानी व्यक्ति को समाज के लिए कर्म क्यों करना चाहिए? – भगवद गीता 3:25

प्रश्न: गीता 3:25 में ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म करने में क्या अंतर बताया गया है? उत्तर: गीता 3:25 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसे अज्ञानी व्यक्ति कर्मफल की आसक्ति से कर्म करता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष को भी लोकसंग्रह अर्थात समाज के हित के लिए , आसक्ति छोड़कर कर्म करना चाहिए। क्या हर व्यक्ति को एक ही तरह से कर्म करना चाहिए? कई बार हम देखते हैं कि एक ही काम कोई शांति से करता है, तो कोई वही काम तनाव और अहंकार के साथ। भगवद्गीता 3:25 इसी अंतर को स्पष्ट करती है — और बताती है कि ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में असल फर्क कहाँ होता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:25 – ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में मूल अंतर गीता 3:24 में श्रीकृष्ण कर्म त्याग से होने वाले सामाजिक पतन की बात करते हैं। गीता 3:25 यह बताती है कि कर्म करना सभी के लिए आवश्य...

यदि श्रेष्ठ लोग कर्म न करें तो समाज का क्या होगा? – भगवद गीता 3:24

प्रश्न: गीता 3:24 , में कर्म न करने से क्या हानि बताई गई है? उत्तर: गीता 3:24 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि वे कर्म न करें, तो ये लोक नष्ट हो जाएंगे। कर्म का त्याग समाज में अव्यवस्था फैलाता है और अंततः समस्त प्राणियों के विनाश का कारण बनता है। अगर जिम्मेदार लोग ही अपना कर्तव्य छोड़ दें, तो समाज का क्या होगा? कभी-कभी हमें लगता है कि एक व्यक्ति के कर्म न करने से क्या फर्क पड़ेगा। भगवद्गीता 3:24 इसी भ्रम को तोड़ती है और दिखाती है कि एक स्तर पर की गई निष्क्रियता पूरी व्यवस्था को कैसे प्रभावित करती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:24 – कर्म रुकते ही व्यवस्था क्यों बिखर जाती है? गीता 3:23 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि वे स्वयं कर्म न करें, तो मनुष्य भी कर्म छोड़ देंगे। गीता 3:24 इस विचार को आगे बढ़ाकर उसके गंभीर परिणाम बताती ह...

अगर मैं कर्म न करूँ तो क्या होगा? समाज क्यों बिगड़ जाएगा? – भगवद गीता 3:23

प्रश्न: गीता 3:23 में कर्म न करने के क्या परिणाम बताए गए हैं? उत्तर: गीता 3:23 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि वे कर्म करना छोड़ दें, तो सभी लोग उनके मार्ग का अनुसरण करेंगे। इससे समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी और समस्त प्राणी नष्ट होने की स्थिति में आ जाएंगे। अगर मार्गदर्शक ही कर्म करना छोड़ दे, तो क्या होगा? कल्पना कीजिए कि जिनसे लोग सीखते हैं, जो उदाहरण बनते हैं, वे ही निष्क्रिय हो जाएँ। भगवद्गीता 3:23 इसी कल्पना को सामने रखकर कर्म की अनिवार्यता को स्पष्ट करती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:23 – जब आदर्श कर्म न करे तो समाज क्या सीखता है? गीता 3:22 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि उन्हें स्वयं कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं, फिर भी वे कर्म करते हैं। गीता 3:23 उसी विचार को एक निर्णायक तर्क में बदल देती है — यदि वे कर्म न करें, तो ...

जब श्रीकृष्ण को कोई कर्तव्य नहीं था, फिर भी वे कर्म क्यों करते हैं? – भगवद गीता 3:22

प्रश्न: गीता 3:22 में श्रीकृष्ण अपने कर्म करने के बारे में क्या कहते हैं? उत्तर: गीता 3:22 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि तीनों लोकों में उनके लिए न तो कोई कर्तव्य शेष है और न ही कोई प्राप्त करने योग्य वस्तु, फिर भी वे कर्म करते हैं, ताकि संसार में कर्म का आदर्श बना रहे। अगर किसी को कुछ पाना ही नहीं है, तो वह कर्म क्यों करे? हम मानते हैं कि इंसान कर्म इसलिए करता है क्योंकि उसे कुछ चाहिए — पैसा, सम्मान या सुरक्षा। लेकिन भगवद्गीता 3:22 एक ऐसा प्रश्न उठाती है जो इस सोच को पूरी तरह बदल देता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:22 – पूर्ण होने पर भी कर्म क्यों आवश्यक है? गीता 3:21 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, समाज वैसा ही चलता है। गीता 3:22 उसी विचार को सबसे ऊँचे स्तर तक ले जाती है — जब...

श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, लोग वही क्यों अपनाते हैं? – भगवद गीता 3:21

प्रश्न: गीता 3:21 में समाज के लिए श्रेष्ठ व्यक्ति की क्या भूमिका बताई गई है? उत्तर: गीता 3:21 में श्रीकृष्ण कहते हैं ,कि श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, सामान्य लोग भी वैसा ही अनुसरण करते हैं। वह जो मानक स्थापित करता है, वही संपूर्ण समाज के लिए मार्गदर्शक बन जाता है। क्या एक व्यक्ति का व्यवहार पूरे समाज को प्रभावित कर सकता है? हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे व्यक्तिगत निर्णय सिर्फ हमारे निजी जीवन तक सीमित हैं। भगवद्गीता 3:21 बताती है कि जो व्यक्ति आगे खड़ा होता है, वह अनजाने में कई लोगों की दिशा तय करता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:21 – समाज वही सीखता है, जो वह अपने आदर्शों को करते हुए देखता है गीता 3:21 – जैसा नेता करता है, वैसा ही समाज चलता है गीता 3:20 में श्रीकृष्ण ज्ञानी व्यक्ति के कर्म का महत्व बताते ...

ज्ञानी व्यक्ति लोक-संग्रह के लिए कर्म क्यों करता है? | गीता 3:20

प्रश्न: गीता 3:20 में श्रीकृष्ण कर्म करने का कौन-सा उद्देश्य बताते हैं? उत्तर: गीता 3:20 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जनक जैसे महापुरुषों ने कर्म के द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी। इसलिए सामान्य जन को भी लोकसंग्रह, अर्थात समाज के कल्याण के लिए कर्म करना चाहिए। अगर आत्मज्ञान हो जाए, तो क्या कर्म करना ज़रूरी रहता है? अक्सर लोग सोचते हैं कि ज्ञान प्राप्त होने के बाद कर्तव्य, जिम्मेदारी और कर्म अपने आप समाप्त हो जाते हैं। भगवद्गीता 3:20 इस भ्रम को तोड़ती है और नेतृत्व, आदर्श और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का एक अत्यंत व्यावहारिक सिद्धांत प्रस्तुत करती है। गीता 3:20 – ज्ञानी व्यक्ति क्यों कर्म करता है? गीता 3:20 कर्मयोग का नेतृत्व-आधारित श्लोक है। यह बताता है कि महापुरुष कर्म अपने लिए नहीं, बल्कि लोक-संग्रह (समाज की दिशा) के लिए करते हैं। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्...

आसक्ति छोड़े बिना कर्म क्यों करना चाहिए? – भगवद गीता 3:19

प्रश्न: गीता 3:19 में कर्म करने की सही विधि क्या बताई गई है? उत्तर: गीता 3:19 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को फल की आसक्ति छोड़े बिना नहीं, बल्कि फल की आसक्ति छोड़कर निरंतर अपने कर्तव्य कर्म करने चाहिए। ऐसे निष्काम कर्म से ही परम सिद्धि प्राप्त होती है। क्या बिना किसी अपेक्षा के काम करना संभव है? आज अधिकतर लोग काम इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें कुछ पाना होता है — पैसा, पहचान या प्रशंसा। भगवद्गीता 3:19 इस सोच को बदलती है और कर्म को एक उच्च उद्देश्य से जोड़ती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:19 – आसक्ति रहित कर्म ही श्रेष्ठ मार्ग है गीता 3:19 कर्मयोग का सबसे व्यावहारिक और संतुलित सूत्र है। यह श्लोक बताता है कि मनुष्य को कर्म से भागना नहीं चाहिए, बल्कि आसक्ति छोड़कर कर्म करना चाहिए। 📜 भगवद्गीता 3:...