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यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

जब आत्मा में संतोष हो, तब कर्म करने या छोड़ने का क्या अर्थ रह जाता है? – गीता 3:18

प्रश्न: गीता 3:18 में आत्मज्ञानी व्यक्ति की स्थिति कैसी बताई गई है? उत्तर: गीता 3:18 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि आत्मज्ञानी व्यक्ति को न तो कर्म करने से कोई लाभ होता है और न ही कर्म छोड़ने से कोई हानि। वह किसी भी प्राणी पर आश्रित नहीं रहता और आत्मा में ही स्थित रहता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। क्या जीवन का उद्देश्य केवल कर्म करना है? या फिर एक ऐसी अवस्था भी होती है, जहाँ मनुष्य कर्म से परे शांति और संतोष का अनुभव करता है? भगवद्गीता 3:18 इसी गहरे प्रश्न का संतुलित और व्यावहारिक उत्तर देती है। गीता 3:18 – कर्तव्य से परे आंतरिक स्वतंत्रता गीता 3:17 में श्रीकृष्ण आत्मतृप्त व्यक्ति की स्थिति बताते हैं। गीता 3:18 उसी विचार को आगे बढ़ाते हुए यह स्पष्ट करती है कि ऐसा व्यक्ति न तो कर्म से कुछ पाता है, न ही अकर्म से कुछ खोता है। 📜...

आत्मा में संतुष्ट व्यक्ति को कर्म करने की क्या आवश्यकता है? – भगवद गीता 3:17

प्रश्न: गीता 3:17 में आत्मतृप्त व्यक्ति के बारे में क्या कहा गया है? उत्तर: गीता 3:17 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, आत्मा में ही रमण करता है और आत्मा में ही तृप्त होता है, उसके लिए कोई भी कर्तव्य कर्म शेष नहीं रहता। क्या हर इंसान को समाज के नियमों के अनुसार ही जीना चाहिए? या फिर ऐसा भी जीवन संभव है, जहाँ व्यक्ति भीतर से पूर्ण हो, बिना किसी बाहरी दबाव के? भगवद्गीता 3:17 इसी प्रश्न का अत्यंत सूक्ष्म और संतुलित उत्तर देती है। गीता 3:17 – आत्मतृप्त व्यक्ति का स्वतंत्र जीवन गीता 3:16 में श्रीकृष्ण कर्म-चक्र से कटे जीवन की चेतावनी देते हैं। लेकिन गीता 3:17 उसी के तुरंत बाद एक अपवाद प्रस्तुत करती है। यह श्लोक बताता है कि हर व्यक्ति के लिए कर्म-बंधन एक-सा नहीं होता। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। 📜 ...

जो कर्म-चक्र नहीं मानता उसका क्या होता है? – भगवद गीता 3:16

प्रश्न: गीता 3:16 में कर्म और यज्ञ के चक्र की अवहेलना करने वाले के बारे में क्या कहा गया है? उत्तर: गीता 3:16 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति इस संसार में स्थापित कर्म और यज्ञ के चक्र का पालन नहीं करता, वह पापमय जीवन जीता है। ऐसा व्यक्ति इंद्रियों के सुख में फँसकर अपना जीवन व्यर्थ कर देता है। क्या केवल अपनी इच्छा , के अनुसार जीना ही आज़ादी है? आज बहुत से लोग नियम, जिम्मेदारी और समाज से दूर होकर “खुद के लिए जीना” चाहते हैं। लेकिन क्या ऐसा जीवन वास्तव में संतोष देता है? भगवद्गीता 3:16 इसी सोच को सीधे चुनौती देती है और एक कठोर लेकिन सच्चा प्रश्न पूछती है। गीता 3:16 – जीवन-चक्र से कटे व्यक्ति की वास्तविक स्थिति गीता 3:16 कर्मयोग के पूरे सिद्धांत का चेतावनी वाला श्लोक है। यह बताता है कि जो व्यक्ति सृष्टि के कर्म-चक्र को नकारता है, वह बाहर से स्वतंत्र दिख सकता है, लेकिन भीतर से खोखला हो जाता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक ...

कर्म का स्रोत क्या है? वेद और यज्ञ का गूढ़ संबंध – भगवद गीता 3:15

प्रश्न: गीता 3:15 में वेद, कर्म और यज्ञ का क्या संबंध बताया गया है? उत्तर: गीता 3:15 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि वेद कर्म से उत्पन्न हुए हैं और कर्म ब्रह्म से प्रकट हुआ है। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदैव यज्ञ में प्रतिष्ठित रहता है और यज्ञ ही कर्म का आधार है। क्या आपने कभी सोचा है कि आपका रोज़ का छोटा-सा काम, किसी बड़ी व्यवस्था से जुड़ा हो सकता है? भगवद्गीता 3:15 इसी गहरे रहस्य को खोलती है — जहाँ कर्म, ज्ञान और सृष्टि एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही प्रवाह के हिस्से हैं। गीता 3:15 – कर्म, यज्ञ और सृष्टि का अदृश्य नियम आज का मनुष्य परिणाम के पीछे भागता है, लेकिन गीता 3:15 परिणाम से पहले कर्म की जड़ को समझने का आग्रह करती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। 📜 गीता 3:15 का संस्कृत श्लोक कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्...

अन्न, वर्षा और कर्म का चक्र क्या है? सृष्टि का नियम – भगवद गीता 3:14

प्रश्न: गीता 3:14 में अन्न, यज्ञ और कर्म का आपसी संबंध क्या बताया गया है? उत्तर: गीता 3:14 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि सभी प्राणी अन्न से जीवित रहते हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है। इस प्रकार संपूर्ण सृष्टि कर्म और यज्ञ के चक्र पर आधारित है। क्या आपने कभी सोचा है कि जीवन में कुछ भी अपने आप नहीं होता? हर सुविधा, हर संसाधन, किसी न किसी कर्म-श्रृंखला से जुड़ा होता है। भगवद गीता 3:14 इसी अदृश्य श्रृंखला को बहुत सरल और गहरे तरीके से समझाती है। यह श्लोक बताता है कि जीवन एक चक्र है — और हर कड़ी हमारी जिम्मेदारी से जुड़ी है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। भगवद गीता 3:14 – मूल श्लोक अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥ गीता 3:14 – यज्ञ, वर...

यज्ञ से बचे अन्न का क्या महत्व है? पाप से मुक्ति का रहस्य – भगवद गीता 3:13

प्रश्न: गीता 3:13 में यज्ञ से भोजन और पाप से मुक्ति के बारे में क्या कहा गया है? उत्तर: गीता 3:13 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञ से उत्पन्न अन्न को ग्रहण करने वाले सज्जन पुरुष सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। जो लोग केवल अपने लिए भोजन पकाते हैं, वे वास्तव में पाप का ही सेवन करते हैं। हम रोज़ भोजन करते हैं, लेकिन शायद ही कभी यह सोचते हैं कि हम जो खा रहे हैं, वह केवल शरीर को नहीं, हमारे मन और विचारों को भी प्रभावित करता है। भगवद गीता 3:13 भोजन को सिर्फ भोग नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक विषय बनाती है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि भोजन भी जिम्मेदारी के साथ जुड़ा है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। भगवद गीता 3:13 – मूल श्लोक यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥ भगवद गीता 3:13 ...

क्या हम अनजाने में पाप कर रहे हैं? – भगवद गीता 3:12

प्रश्न: गीता 3:12 में देवताओं और मनुष्य के संबंध के बारे में क्या बताया गया है? उत्तर: गीता 3:12 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि यज्ञ से प्रसन्न होकर देवता मनुष्य को आवश्यक भोग और सुविधाएँ प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति देवताओं से प्राप्त वस्तुओं का उपभोग बिना यज्ञ किए करता है, वह चोर कहलाता है। क्या आपने कभी महसूस किया है कि हम बहुत कुछ पा लेते हैं, लेकिन उसके लिए आभार महसूस नहीं करते? जैसे सुविधाएँ, रिश्ते और संसाधन अपने आप मिलने चाहिए — ऐसा मान लेते हैं। भगवद गीता 3:12 इसी अधिकार-भाव को बहुत स्पष्ट शब्दों में चुनौती देती है। यह श्लोक कृतज्ञता को आध्यात्मिक और नैतिक आधार बनाता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। भगवद गीता 3:12 – मूल श्लोक इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥...